
छुरमल देव
छुरमल देव, जिन्हें छुरमल देवता के नाम से भी जाना जाता है, उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र के अत्यंत पूजनीय लोक देवताओं में से एक हैं। उन्हें शक्ति, न्याय, संरक्षण और लोककल्याण के प्रतीक के रूप में माना जाता है। कुमाऊँ के पिथौरागढ़, बागेश्वर और अल्मोड़ा जनपदों सहित अनेक क्षेत्रों में इनके मंदिर स्थापित हैं। विशेष रूप से सिरा, अस्कोट और गंगोलीहाट क्षेत्र में इनकी विशेष मान्यता है।
धार्मिक महत्व एवं पूजा
कुमाऊँ की लोक परंपराओं में छुरमल देवता को पशुधन, कृषि और ग्रामीण जीवन का संरक्षक माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वे पशुओं को रोगों, प्राकृतिक आपदाओं और जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं तथा किसानों को समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में छुरमल देवता की पूजा अक्सर उनके पिता कालसिन देवता (काशीन देव) के साथ की जाती है। विशेष अवसरों, धार्मिक उत्सवों तथा पारिवारिक अनुष्ठानों पर “जागर” का आयोजन किया जाता है। जागर कुमाऊँ की एक प्राचीन लोक परंपरा है, जिसमें ढोल-दमाऊ की पवित्र ध्वनि के साथ देवताओं का आह्वान कर उनसे मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
कालसिण और छुरमल
छुरमल देव के पिता का नाम कालसिण (कालसिन) बताया जाता है। कुमाऊँ की लोकपरंपरा में पिता-पुत्र दोनों की कथाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि अनेक स्थानों पर दोनों के मंदिर आमने-सामने स्थापित किए जाते हैं, किंतु एक ही गर्भगृह या मंदिर में उनकी स्थापना सामान्यतः नहीं की जाती।
ख्वांतड़ी और सतगढ़ क्षेत्र में कालसिण और छुरमल दोनों के प्रमुख देवस्थल स्थित हैं और यह क्षेत्र उनकी आराधना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
छुरमल देवता की पौराणिक लोककथा
कुमाऊँ की लोकगाथा के अनुसार छूरमल के पिता कालसिण का विवाह रिखिमन (ऋषिमणि) की पुत्री हिउंला (हयूंला) से हुआ था. हयूंला अभी बालिका ही थी. विवाह के बाद वह उसके पालन-पोषण का भार अपनी माँ को सौंप कर देवताओं के आमंत्रण पर देवसभा में चला गया और वहां इन्द्र का दीवान हो गया. दीर्घकाल के बाद जब वह घर आया तो हिउंला भरपूर यौवन की देहरी पर खड़ी हो चुकी थी. अपने पति को देख कर उसने उस पर अपनी युवा पत्नी की उपेक्षा करने का आरोप लगाया. कालसिण को बहुत बुरा लगा और वह इस नवयौवना पत्नी के वाग्याणों से आहत होकर पुनरू इन्द्रपुरी लौट गया, किन्तु हयूंला पति मिलन की अतृप्त वासना को लेकर अपनी सास के पास ही उसके पुनः लौटकर आने की प्रतीक्षा में बैठी रही. प्रकृति ने तो किसी की प्रतीक्षा करनी थी नहीं. नैसर्गिक प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और वह रजस्वला होने लगी. उसकी सास ने उसके रज-स्नान के लिये घर के अंदर ही एक ऐसा स्नानागार बनवाया जिसमें कहीं से एक छिद्र भी नहीं छोड़ा गया था. पर एक दिन हयूंला ज्यों ही अनावृत होकर स्नान कर रही थी तो एक अतिलघु छिद्र से होकर सूर्य की एक किरण उसके गुप्तांग पर जा पड़ी और उसके प्रभाव से ही वह गर्भवती हो गयी. इस अप्रत्याशित घटना से सास और बहू दोनों ही विचलित हो उठे. उसकी सास सोचने लगी मेरा पुत्र तो चिरकाल से इन्द्र की सभा में है, फिर हयूंला के पांव भारी कैसे हो गये? उसने अपने पालतू तोते के गले में पत्र बांधकर यह समाचार अपने पुत्र कलुवा (कालसिण) के पास भेजा. इसे पढ़कर वह भी विचलित हो उठा तथा वास्तविकता का पता लगाने के लिए तत्काल धूमाकोट की ओर चल पड़ा. मार्ग में उसके पिता के मित्र मोतिया दर्जी का घर पड़ता था. कालसिण ने उसे सारा वृत्त सुनाकर उसकी वास्तविकता का पता लगाने का उपाय पूछा. मोतिया ने उसे एक दरँती दौंखी इलायची दी और कहा कि भोजन के उपरान्त तुम इसे भोजन की थाली में डाल देना, सब कुछ ज्ञात हो जायेगा. वह घर गया. मां ने भोजन परोसा और उसने भोजन के बाद थाली में उस इलायची को डाल दिया.
जब हयूंला इसके बाद थाली में भोजन करने गयी तो वह उसमें पड़ी इलायची को देखकर बिना भोजन किये ही लौट गयी. उसके इस व्यवहार से क्रुद्ध होकर कालसिण पुनः इन्द्रपुरी को लौट गया.
इघर हयूंला को दस माह पूरे होने लगे. उसे प्रसवासन्न देखकर सास ने उसे घर से निकाल दिया. वह शरण के लिए अपने हलिया (हलवाहे) के पास गयी. पर उसने उसे इस रूप में शरण देने से इन्कार कर दिया. इस प्रकार शरण की खोज में भटकते-भटकते उसे अर्धरात्रि हो गयी. प्रसव पीड़ा प्रारम्भ हो गयी. पीड़ा से व्यथित होकर वह ऊखल कूटने बाली छानी (घास फूंस की झोपड़ी) में जाकर अपने दुर्भाग्य तथा ईश्वर प्रदत्त इस क्रूर उपहास को कोसती हुईं अति करुण स्वर में क्रन्दन करने लगी. ठीक अर्थरात्रि के समय छुरमल (सूर्य-पुत्र) ने जन्म लिया और अपनी बिलखती हुई मां को आश्वासन देता हुआ कहने लगा- ‘मां तू इस प्रकार व्याक्युल न हो, मुझे मेरे पिता का नाम व पता बता.’ हयूंला ने कहा – ‘पुत्र ! मेरे पति का नाम कालसिण है जो कि आजकल इन्द्र की सभा में उसके दीवान हैं.’
नवजात शिशु अपने नाभिनाल को अपने कमर में लपेट कर इन्द्रलोक में जा पहुंचा. उसके वहां पहुंचने पर इन्द्रलोक डावांडोल हो उठा और सारे देवता लोग भी भयभीत हो उठे. इन्द्र की सभा में पहुंचकर बालक ने गरज का पूछा-‘मेरा पिता कलुवा दीवान कहां है?’ यह सुनकर कालसिण चकित होकर पूछने लगा- ‘हे बालक तू कौन है जो कि मुझे अपना पिता कह रहा है? और किस प्रकार से मेरा पुत्र है?’ इस पर वहां पर काफी देर तक प्रश्नोत्तर चलता रहा. बालक ने अपने जन्म से सम्बद्ध सारी स्थिति को स्पष्ट कर दिया, पर वह माना नहीं. इसके बाद उसने उसके समक्ष यह शर्त रखी कि यदि वह गागर (गर्गाचल) के जंगल से एक सिंह को पकड़कर उसके सामने ले आयेगा तो वह उसे अपना पुत्र स्वीकार कर लेगा. इस पर बालक छुरमल गागर के जंगल में जाकर एक शेर को पकड़कर ले आया. इसके बाद भी वह कई कठिनतम शर्तें रखता गया और छुरमल उन्हें पूरा करता गया. अन्त में उसने यह शर्त रखी कि मैं तुम्हें सात समुन्दर पार लोहे के कड़ाओं में बन्द करूंगा और इधर सात समुन्दर पार से तुम्हारी मां ह्यूंला अपनी छाती से दूध की धार मारेगी. यदि वह तुम्हारे मुंह में ही जायेगी तो मैं तुम्हें तथा तुम्हारी मां दोनों को स्वीकार कर लूंगा. इस परीक्षण में भी वह सफल हो गया.
फिर कालसिण ने उसे पुत्र के रूप में स्वीकार करते हुए उसकी पीठ थपथपायी और आशीर्वाद देते हुए कहा:
‘यद्यपि तू मेरा पुत्र है पर हम दोनों आमने-सामने होने पर भी कभी साथ नहीं मिलेंगे।”.
इसी मान्यता के कारण आज भी कालसिण (काशीन देव) और छुरमल देव के मंदिर प्रायः एक-दूसरे के सामने या समीप स्थापित किए जाते हैं, परंतु एक ही देवालय में नहीं। इसमें मानव कल्याणार्थ कालसिण की तथा पशु सम्पदा के कल्याणार्थ छुरमल की पूजा की जाती है.
छुरमल देव की पूजा कुमाऊँ की समृद्ध लोकसंस्कृति, आस्था और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकगाथाओं और जागरों के माध्यम से जीवित है।
जय छुरमल देव।
प्रमुख मंदिर
ख्वांतड़ी छुरमल देव मंदिर
ख्वांतड़ी क्षेत्र में काशीन देव (कालसिण ,कालसिन) और छुरमल देव दोनों के प्रमुख देवस्थल स्थित हैं और यह क्षेत्र उनकी आराधना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

सतगढ़ / कनालीछीना मंदिर
सतगढ़ और कनालीछीना क्षेत्र में काशीन देव (कालसिण कालसिन) और छुरमल देव दोनों के प्रमुख देवस्थल स्थित हैं और यह क्षेत्र उनकी आराधना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
धनलेख मंदिर, अस्कोट
पिथौरागढ़ जनपद के अस्कोट क्षेत्र में स्थित धनलेख पर्वत पर छुरमल देवता का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है तथा प्रतिवर्ष यहाँ भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
कांडाछीना मंदिर, गंगोलीहाट
गंगोलीहाट के निकट कांडाछीना में स्थित मंदिर भी छुरमल देवता का एक महत्वपूर्ण एवं प्राचीन धार्मिक स्थल माना जाता है। यहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन एवं पूजा-अर्चना के लिए पहुँचते हैं।
रांख (मशाल) परंपरा
छुरमल देवता के वार्षिक महोत्सव के दौरान एक अनूठी परंपरा का निर्वहन किया जाता है। ऋषि पंचमी के आसपास आयोजित इस उत्सव में लगभग 32 फीट लंबी विशाल मशाल, जिसे स्थानीय भाषा में “रांख” कहा जाता है, प्रज्वलित की जाती है। श्रद्धालु रात के समय इस मशाल को लेकर मंदिर की परिक्रमा करते हैं। यह परंपरा देवता के प्रति श्रद्धा, समर्पण और सामूहिक एकता का प्रतीक मानी जाती है।

