Kasheen Dev Temple Kasindhura Pithoragarh

ॐ नमः शिवाय

जय ईष्ट देव



.About
श्री काशीन देव मंदिर काशीनधुरा (Kasheenadhura) उत्तराखंड की आध्यात्मिक धरोहरों में से एक है। इस पवित्र स्थल को छोटा केदार ,कालसिण देव मंदिर Kalsin Dev ,कालसिन देव मंदिर,कालछिन देवता मंदिर Kalchhin Devta ,कालसिन देवता मंदिर ,कालशिण (कासिंग) देव मंदिर, Kaasin Dhura Temple, Kasindhura, Kashin Dhura तथा Kasin Dhura नामों से भी जाना जाता है।
मदकोट के पास ‘श्री कालछिन मंदिर मदकोट’ को इनका (काशीन देवता )का मूल स्थान माना जाता है।इसे ‘छोटा केदार‘ के नाम से भी जाना जाता है और यहाँ केदारनाथ शिवलिंग की प्रतिकृति (Replica of Kedarnath shivling) मौजूद है



यहां मंदिर का इतिहास, धार्मिक गतिविधियां, ताज़ा समाचार, फोटो गैलरी एवं दानदाताओं की जानकारी उपलब्ध है।

काशीन (कालछिन/कालसिन/कालशिण (कासिंग) ) देवता कौन हैं?

पौराणिक मान्यता: कुमाऊं क्षेत्र में काशिन देवता (जिन्हें कालछिन/कालसिन /कालशिण (कासिंग) भी कहा जाता है) को मां कालिका का पुत्र और प्रसिद्ध लोक देवता गोलज्यू (गोरिल महाराज) का बड़ा भाई माना जाता है।

प्रकृति के देवता: इन्हें प्रकृति का देवता माना जाता है; ऐसी मान्यता है कि वर्षा, धूप, सर्दी और गर्मी सब इन्हीं के आदेश से होती है।

छुरमल देवता से संबंध: काशीन (कालछिन) के पुत्र ‘छुरमल‘ हैं। लोक मान्यता के अनुसार, पिता और पुत्र (काशीनऔर छुरमल) के मंदिर कभी एक साथ नहीं बनाए जाते, बल्कि हमेशा आमने-सामने बनाए जाते हैं।

इंद्र के दीवान: लोक-कथाओं में इन्हें देवराज इंद्र का दीवान भी बताया गया है।

काशीन देव से जुड़ी कुछ प्रमुख लोक-मान्यताएँ और कथाएँ

न्याय के देवता की मान्यता: कुमाऊं में गोल्ज्यू (गोलू देवता) की तरह काशीन देव को भी ‘न्याय का राजा’ माना जाता है। एक प्रचलित लोक-कथा के अनुसार, यदि समाज में या किसी परिवार में किसी के साथ कोई छल, कपट या अन्याय होता है और कानून से न्याय नहीं मिलता, तो पीड़ित व्यक्ति मंदिर में आकर अपनी ‘पुकार’ लगाता है। मान्यता है कि काशीन देव दोषी को बहुत जल्द उसकी गलती का अहसास करा देते हैं और पीड़ित को न्याय दिलाते हैं।

दूध और मवेशियों की रक्षा की कहानी: पहाड़ों में पशुधन (गाय-भैंस) ही आजीविका का मुख्य साधन होते हैं। ग्रामीणों की लोक-कथाओं के अनुसार, जब भी कोई गाय या भैंस पहली बार बच्चा देती है, तो उसके दूध का पहला हिस्सा (जिसे स्थानीय भाषा में ‘बिसुड़’ या ‘स्यूं’ कहते हैं) सबसे पहले काशीन देव को चढ़ाया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से जानवर स्वस्थ रहते हैं और उन्हें बाघ या अन्य जंगली जानवरों से कोई खतरा नहीं होता।

हरियाली और अच्छी फसल की मन्नत: खेती शुरू करने से पहले या फसल कटने के बाद, काशीन देव को धन्यवाद देने की परंपरा है। यदि कभी क्षेत्र में सूखा पड़ता है, तो ग्रामीण मंदिर में जाकर विशेष पूजा-अर्चना और लोक-अनुष्ठान करते हैं। लोक-कथाओं के अनुसार, देवता की प्रसन्नता से क्षेत्र में समय पर बारिश होती है और फसलें हरी-भरी रहती हैं।

प्रमुख मंदिर एवं स्थान

उत्तराखंड (कुमाऊं क्षेत्र):
• पिथौरागढ़ में श्री काशिनधुरा मंदिर ग्रामसभा ख्वांतड़ी(कनालीछीना), मदकोट और गंगोलीहाट के पास ऊंची पहाड़ियों पर काशीन (कालछिन/कालसिन/कालशिण)देवता के प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं।
• मदकोट के पास ‘श्री कालछिन मंदिर मदकोट‘ को इनका मूल स्थान माना जाता है।
• इसके अलावा Tallisar, Pithoragarh, Suti Tamta, Amatari आदि क्षेत्रों में भी काशीन (कालछिन/कालसिन/कालसिण) देवता के अनेकों मंदिर हैं।

श्री कालशिण कासिंग देव मंदिर: इसी तरह का एक अन्य प्रसिद्ध कासिंग देव मंदिर उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कांडा क्षेत्र (धारी मध्यां) में भी स्थित है, जहाँ धार्मिक आयोजन और श्रीमद्भागवत कथाएं होती हैं।
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श्री काशिनधुरा मंदिर 🛕 ग्रामसभा ख्वांतड़ी(कनालीछीना)

वों के देव महादेव भगवान शिव के स्वरूपों में से एक कालभैरव भगवान काशिन देव का पावन मंदिर भारत-नेपाल तथा तिब्बत (चीन) की सीमाओं के निकट, हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जनपद के ख्वांतड़ी ग्राम में प्राचीन काल से स्थित है। यह मंदिर क्षेत्र की आस्था, श्रद्धा और लोकविश्वास का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

Kasheen Dev Temple Kasindhura Pithoragarh

लोक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव जब कैलाश की ओर प्रस्थान करते थे, तब इस स्थान पर विश्राम अवश्य करते थे। इसी कारण यह पवित्र धाम भगवान भोलेनाथ की विश्रामस्थली के रूप में भी प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहाँ दर्शन करने आता है, वह भगवान काशिन देव की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति करता है।

नवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर का विशेष महत्व है। दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर माता भगवती एवं भगवान शिव की आराधना करते हैं। नौ दिनों तक चलने वाले धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक वातावरण संपूर्ण क्षेत्र को भक्तिमय बना देते हैं। अनेक श्रद्धालु इन दिनों मंदिर परिसर में ही निवास कर साधना एवं पूजा-अर्चना में समय व्यतीत करते हैं।

मंदिर तक पहुँचने के लिए कुछ दूरी पैदल यात्रा करनी पड़ती है। मार्ग थोड़ा दुर्गम अवश्य है, किंतु हिमालयी प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति इस यात्रा को अविस्मरणीय बना देते हैं। स्थानीय सामंत परिवार सदियों से मंदिर की सेवा और श्रद्धालुओं की सहायता में समर्पित रहा है। यह परिवार भगवान काशिन देव को अपना आराध्य एवं इष्ट देव मानता है तथा प्रतिवर्ष सामूहिक एवं व्यक्तिगत रूप से यहाँ पूजा-अर्चना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करता है।

श्री कालछिन देवता मंदिर 🛕(मदकोट)

मदकोट के पास ‘श्री कालछिन मंदिर मदकोट’ को इनका (काशीन देवता )का मूल स्थान माना जाता है।इसे ‘छोटा केदार‘ के नाम से भी जाना जाता है और यहाँ केदारनाथ शिवलिंग की प्रतिकृति (Replica of Kedarnath shivling) मौजूद है


कुमाऊँ की देवभूमि में अनेक लोक देवताओं की पूजा की जाती है। इन लोक देवताओं में श्री कालछिन(काशिन) देवता का विशेष स्थान है। कुमाऊँ के कई क्षेत्रों के लोग उन्हें अपना इष्टदेव मानते हैं। जनमान्यता है कि कालछिन(काशिन) देवता का मुख्य निवास स्थान पिथौरागढ़ जनपद के मदकोट गांव में स्थित है, जहाँ नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होते हैं।

मदकोट के श्री कालछिन(काशिन) देवता मंदिर में नवरात्रि का एक दिन

कुमाऊँ की देवभूमि में अनेक लोक देवताओं की पूजा की जाती है। इन लोक देवताओं में श्री कालछिन(काशिन) देवता का विशेष स्थान है। कुमाऊँ के कई क्षेत्रों के लोग उन्हें अपना इष्टदेव मानते हैं। जनमान्यता है कि कालछिन(काशिन) देवता का मुख्य निवास स्थान पिथौरागढ़ जनपद के मदकोट गांव में स्थित है, जहाँ नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होते हैं।

नवरात्रि की एक संध्या का दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है। शाम लगभग सात बजे मंदिर परिसर में आरती की तैयारियाँ आरम्भ हो जाती हैं। मुख्य पुजारी और उनके सहयोगी मंदिर को सजाने और पूजा की व्यवस्था में जुट जाते हैं। धीरे-धीरे गाँव के लोग मंदिर में एकत्र होने लगते हैं। वातावरण में भक्ति और उत्साह का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

आरती और परिक्रमा से पहले एक बड़े पात्र में शंख, घंटियाँ और भंकोरे रख दिए जाते हैं। बच्चे, महिलाएँ और पुरुष अपनी-अपनी पसंद की घंटियाँ हाथ में ले लेते हैं। जैसे ही आरती प्रारम्भ होती है, शंखध्वनि और घंटियों की मधुर आवाज पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है।

आरती के बाद मुख्य पुजारी सबसे आगे दीप लेकर चलते हैं। उनके पीछे बाजा बजाने वाले और फिर समस्त श्रद्धालु मंदिर की तीन परिक्रमा करते हैं। इस दौरान शंख, घंटियों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब जाता है।

यह पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक सामूहिक सामाजिक आयोजन भी है। नवरात्रि के नौ दिनों तक गाँव के विभिन्न परिवार बारी-बारी से मंदिर आने वाले भक्तों, बाजा बजाने वालों और अतिथियों के भोजन तथा चाय-पानी की व्यवस्था करते हैं। इससे गाँव में आपसी सहयोग और एकता की भावना और भी मजबूत होती है।

भोजन के पश्चात लोग पुनः एकत्रित होते हैं। बाजे को गर्म किया जाता है ताकि उसमें मधुर और प्रभावशाली ध्वनि निकल सके। मंदिर की ओर प्रस्थान करने से पूर्व थोड़ी देर तक पारंपरिक नृत्य होता है, जिसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।

मंदिर जाते समय कुमाऊँ की प्रसिद्ध लोक शैली चाँचरी गाई जाती है। इस लोकगीत में हास्य और पारिवारिक स्नेह का सुंदर चित्रण होता है। गीत के अनुसार जीजा अपनी साली को मेले में साथ चलने के लिए कहता है, जबकि साली नए कपड़े, गहने और जूते न होने का बहाना बनाकर मना करती है। यह गीत ग्रामीण जीवन की सरलता और लोकसंस्कृति की मिठास को दर्शाता है।

मंदिर पहुँचने और परिक्रमा पूरी होने के बाद भक्तों का विश्वास है कि कालछिन(काशिन)देवता अवतरित होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसके पश्चात भजन-कीर्तन का आयोजन होता है, जिसमें देवी-देवताओं की महिमा का गुणगान किया जाता है।

रात बढ़ने के साथ पारंपरिक लोकगायन “ढुस्का” और “झाँचरी” का कार्यक्रम आरम्भ होता है। ढोल और अन्य वाद्ययंत्रों की धुन पर लोकगायक पारंपरिक गीत प्रस्तुत करते हैं। यह महफिल डेढ़ से दो घंटे तक चलती है और पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर देती है।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में पुनः देवताओं का आवाहन किया जाता है। श्रद्धालु देवता के समक्ष अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। सभी भक्तों को प्रसाद स्वरूप फल वितरित किए जाते हैं। मंदिर कक्ष में उपस्थित लोगों को बारी-बारी से बुलाकर आशीर्वाद दिया जाता है और चाय के साथ सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।

इस प्रकार नवरात्रि का एक दिन संपन्न होता है। यही क्रम लगातार नौ दिनों तक चलता है। दशमी के दिन विशेष पूजा और विशाल धार्मिक आयोजन के साथ नवरात्रि का समापन किया जाता है। प्रसाद वितरण और सामूहिक सहभागिता के साथ पूरा गाँव इस पावन पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाता है।

श्री कालछिन(काशिन) देवता मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि कुमाऊँ की लोक आस्था, संस्कृति, सामाजिक एकता और परंपराओं का जीवंत केंद्र है, जहाँ आज भी सदियों पुरानी परंपराएँ श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं।

श्री कालसिन देवता मंदिर 🛕गंगोलीहाट

कुमाऊँ की भूमि अपनी समृद्ध संस्कृति, लोक परंपराओं, देवी-देवताओं और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यहाँ केवल बड़े मंदिर ही नहीं, बल्कि अनेक लोक देवताओं की भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। इन्हीं लोक देवताओं में एक प्रमुख नाम है श्री कालसिन देवता का, जिनका मंदिर पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट क्षेत्र में एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है।

श्री कालसिन (कालसिल) देवता की अद्भुत कथा

लोकमान्यता के अनुसार कालसिन देवता को कुमाऊँ के प्रसिद्ध लोक देवता गोलू देवता (गोरिल देव) का बड़ा भाई माना जाता है। कथा के अनुसार चम्पावत के राजा झालुराय की कई रानियाँ थीं। उनमें से एक रानी कलिंगा (कालिका) के गर्भ से पुत्र जन्म लेने वाला था। अन्य रानियों ने ईर्ष्या वश राजा के सामने यह झूठ फैला दिया कि रानी ने पुत्र नहीं, बल्कि एक सिलबट्टे को जन्म दिया है।

जब यह सिलबट्टा रानी के सामने लाया गया, तब माता के सतीत्व, तप और दिव्य शक्ति से उसमें प्राणों का संचार हो गया। वही सिलबट्टा आगे चलकर कालसिन देवता के रूप में पूजित हुआ। इस कारण कालसिन देवता को न्याय, सत्य और दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है।सिल को कालसिल और बट्टे को लोड़ी देवता के रूप में हमारे कुमाऊँ में पूजा जाता है|

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि कालसिन देवता केवल लोक देवता ही नहीं बल्कि प्रकृति के भी अधिष्ठाता हैं। वर्षा, धूप, सर्दी और गर्मी जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भी उनकी इच्छा से संचालित होती हैं। क्षेत्र के लोग किसी भी महत्वपूर्ण धार्मिक कार्य, पूजा, अनुष्ठान या मांगलिक कार्य से पहले उनका स्मरण अवश्य करते हैं।

गंगोलीहाट को देवभूमि का विशेष स्थान प्राप्त है। यहाँ पाताल भुवनेश्वर, महाकाली मंदिर, हाट कालिका तथा अनेक अन्य देवस्थल स्थित हैं। कहा जाता है कि इस भूमि के कण-कण में देवताओं का वास है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यदि किसी का पैर किसी पत्थर से टकरा जाए तो वह उसे प्रणाम करता है, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उस पत्थर में भी किसी लोक देवता का निवास हो सकता है।

वीडियो में मंदिर के प्रधान पुजारी शैलेन्द्र बिष्ट जी बताते हैं कि वर्तमान मंदिर पहले बहुत छोटा था। बाद में श्रद्धालुओं के सहयोग से इसका विस्तार किया गया। उन्होंने एक रोचक घटना का भी उल्लेख किया कि मंदिर निर्माण के दौरान उन्हें स्वप्न में शिवलिंग दिखाई दिए। बाद में जब उस स्थान पर खुदाई की गई तो वास्तव में वहाँ से 4 शिवलिंग प्राप्त हुए। इसे भक्तजन कालसिन देवता की कृपा और चमत्कार मानते हैं।

आज भी दूर-दूर से श्रद्धालु कालसिन देवता के दर्शन के लिए आते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि कुमाऊँ की प्राचीन लोक संस्कृति, इतिहास और परंपराओं का भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।

संदेश:
श्री कालसिन देवता की यह कथा हमें सत्य, आस्था, मातृशक्ति और लोक परंपराओं के महत्व का बोध कराती है। कुमाऊँ की सांस्कृतिक विरासत में ऐसे लोक देवता आज भी लोगों के जीवन, विश्वास और पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं।

श्री कालशिण (कासिंग) देव मंदिर 🛕कांडा बागेश्वर

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कांडा (धारी मध्यां) क्षेत्र में स्थित कालशिण (कासिंग) देव मंदिर और यहाँ के प्रसिद्ध कालिका मंदिर का इतिहास लगभग 1,000 साल पुराना है और इसका संबंध आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ा माना जाता है।



इतिहास और स्थापना की कथा
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापना: लोक मान्यताओं और स्थानीय इतिहास के अनुसार, 10वीं शताब्दी में जब आदि गुरु शंकराचार्य कैलाश मानसरोवर यात्रा या भ्रमण के दौरान इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब कांडा क्षेत्र में ‘काल’ (अदृश्य संकट या भय) का बड़ा आतंक था।

काल का कीलन:
स्थानीय लोगों की पीड़ा को देखकर आदि शंकराचार्य ने स्थानीय लोहारों के माध्यम से लोहे के नौ कड़ाहे (कढ़ाई) बनवाए और अपनी योग शक्ति से उस अदृश्य काल को सात कड़ाहों के नीचे दबाकर उसके ऊपर एक विशाल शिला रख दी (जिसे काल कीलन कहा जाता है)।

माँ कालिका और कालशिण देव की स्थापना:
इसी स्थान पर एक पेड़ की जड़ के पास उन्होंने माँ कालिका और कालशिण (कासिंग) देव की स्थापना की, जिसके बाद यहाँ से भय और आतंक समाप्त हो गया। आज भी वह ऐतिहासिक शिला मंदिर परिसर में मौजूद है।

ऐतिहासिक कालक्रम और बदलाव

कत्युरी और चंद वंश का प्रभाव:
कांडा क्षेत्र प्राचीन काल में 7वीं से 13वीं शताब्दी तक कत्युरी राजाओं के प्रभाव में रहा, उसके बाद गंगोली के मंकोटी राजाओं के अधीन आया और 16वीं शताब्दी में चंद वंश (बालो कल्याण चंद) के राजाओं ने इस क्षेत्र को कुमाऊं साम्राज्य में मिला लिया।
मंदिर का जीर्णोद्धार:
शुरुआत में यह मंदिर काफी छोटा था। समय के साथ वर्ष 1947 में इसका पुनर्निर्माण किया गया। इसके पश्चात 1998 में स्थानीय जनता और श्रद्धालुओं के आपसी सहयोग से यहाँ एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।
पुजारी परंपरा: इस ऐतिहासिक मंदिर में पूजा-अर्चना और व्यवस्था की जिम्मेदारी परंपरागत रूप से स्थानीय नाग कन्याल गाँव के कांडपाल परिवार के लोगों द्वारा निभाई जाती है
लोक देवता के रूप में पूजनीय:
कुमाऊं क्षेत्र में कई ऐसे मंदिर हैं जो किसी राजा या शास्त्रीय भगवान के बजाय स्थानीय वीर पुरुषों या रक्षकों को समर्पित होते हैं, जिन्हें बाद में देवता का स्थान दे दिया जाता है। कासिंग देव को भी धारी मध्यां और कांडा क्षेत्र के ग्रामीणों द्वारा क्षेत्रपाल (भूमि के रक्षक) या ग्राम देवता के रूप में सदियों से पूजा जा रहा है।

न्याय और मन्नत का केंद्र:
स्थानीय इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, कासिंग देव को एक जागृत देवता माना जाता है। पुरानी परंपरा रही है कि जब भी किसी ग्रामीण के साथ कोई अन्याय होता है या उनकी फसल व मवेशियों पर कोई विपत्ति आती है, तो वे कासिंग देव के दरबार में न्याय की गुहार लगाते हैं।

श्रीमद्भागवत कथा और जीर्णोद्धार:
बदलते समय के साथ स्थानीय जनता और प्रवासियों के सहयोग से इस मंदिर का आधुनिक स्वरूप तैयार किया गया है। वर्तमान समय में यह मंदिर क्षेत्र की सामाजिक और धार्मिक एकजुटता का बड़ा केंद्र बन चुका है, जहाँ भव्य कलश यात्राओं और सामूहिक धार्मिक अनुष्ठानों (जैसे भागवत कथा ज्ञान यज्ञ) का आयोजन कर सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखा जा रहा है।
चूँकि यह एक विशुद्ध स्थानीय ग्रामीण आस्था का प्रतीक है, इसलिए इसकी कथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी बुजुर्गों के माध्यम से आगे बढ़ी हैं।

कासिंग देव से जुड़ी कुछ प्रमुख लोक-मान्यताएँ और कथाएँ इस प्रकार हैं:

क्षेत्रपाल और भूमि के रक्षक की कथा: स्थानीय कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में जब कांडा के इस पहाड़ी क्षेत्र में जंगली जानवरों, प्राकृतिक आपदाओं या चोर-डाकुओं का आतंक हुआ करता था, तब कासिंग देव को एक दिव्य रक्षक या वीर पुरुष के रूप में देखा गया। उन्होंने ग्रामीणों और मवेशियों की रक्षा की। उनकी मृत्यु के बाद, ग्रामीणों ने उन्हें अपनी भूमि का रक्षक (क्षेत्रपाल देवता) मानकर उनकी पूजा शुरू कर दी, ताकि गाँव हमेशा सुरक्षित रहे।

न्याय के देवता की मान्यता: कुमाऊं में गोल्ज्यू (गोलू देवता) की तरह कासिंग देव को भी ‘न्याय का राजा’ माना जाता है। एक प्रचलित लोक-कथा के अनुसार, यदि समाज में या किसी परिवार में किसी के साथ कोई छल, कपट या अन्याय होता है और कानून से न्याय नहीं मिलता, तो पीड़ित व्यक्ति मंदिर में आकर अपनी ‘पुकार’ लगाता है। मान्यता है कि कासिंग देव दोषी को बहुत जल्द उसकी गलती का अहसास करा देते हैं और पीड़ित को न्याय दिलाते हैं।

दूध और मवेशियों की रक्षा की कहानी: पहाड़ों में पशुधन (गाय-भैंस) ही आजीविका का मुख्य साधन होते हैं। ग्रामीणों की लोक-कथाओं के अनुसार, जब भी कोई गाय या भैंस पहली बार बच्चा देती है, तो उसके दूध का पहला हिस्सा (जिसे स्थानीय भाषा में ‘बिसुड़’ या ‘स्यूं’ कहते हैं) सबसे पहले कासिंग देव को चढ़ाया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से जानवर स्वस्थ रहते हैं और उन्हें बाघ या अन्य जंगली जानवरों से कोई खतरा नहीं होता।

हरियाली और अच्छी फसल की मन्नत: खेती शुरू करने से पहले या फसल कटने के बाद, कासिंग देव को धन्यवाद देने की परंपरा है। यदि कभी क्षेत्र में सूखा पड़ता है, तो ग्रामीण मंदिर में जाकर विशेष पूजा-अर्चना और लोक-अनुष्ठान करते हैं। लोक-कथाओं के अनुसार, देवता की प्रसन्नता से क्षेत्र में समय पर बारिश होती है और फसलें हरी-भरी रहती हैं।

श्री काशिन देव मंदिर 🛕 खटीमा

समय के साथ उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन बढ़ा है, जिसके परिणामस्वरूप ख्वांतड़ी ग्राम सहित अनेक गाँवों के परिवार तराई क्षेत्र, विशेषकर खटीमा में जाकर बस गए। वहाँ निवास कर रहे सामंत परिवार तथा अन्य श्रद्धालुओं ने अपनी आस्था, परंपरा और भगवान काशिन देव के प्रति अटूट श्रद्धाभाव को जीवित रखने के उद्देश्य से खटीमा में श्री काशिन देव का एक भव्य मंदिर स्थापित कराया।

यह मंदिर मुख्य मंदिर की स्थापत्य शैली और धार्मिक परंपराओं से प्रेरित है तथा स्वरूप में भी काफी हद तक मूल मंदिर के समान दिखाई देता है। आज यह मंदिर खटीमा तथा आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहाँ नियमित रूप से पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान एवं विभिन्न पर्वों का आयोजन किया जाता है, जिससे नई पीढ़ी भी अपने कुल देवता एवं सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहती है।

“श्री काशिन देव की कृपा, आस्था और परंपरा को जोड़ने वाली वह दिव्य शक्ति है, जो हिमालय के ख्वांतड़ी ग्राम से लेकर तराई के खटीमा तक श्रद्धालुओं के हृदयों में समान रूप से विराजमान है।” 🙏

आसपास के प्रमुख धार्मिक स्थल

काशिन देव मंदिर के आसपास अनेक प्राचीन एवं सिद्ध धार्मिक स्थल स्थित हैं, जिनका क्षेत्र की आस्था और संस्कृति में विशेष महत्व है।

🛕छुरमल देव मंदिर

🛕बाबा बेतालेस्वर मंदिर  Betaleshwar Temple


🛕उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थल

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Kasheenadhura (Kasindhura) – Shri Kasheen Dev Mandir

काशीनधुरा (Kasheenadhura) को कई लोग Kasindhura, Kashin Dhura, Kaasin Dhura Temple, Kasin Dhura तथा Kashindhura नाम से भी जानते हैं।
Shri Kaasin Dhura Temple (also known as Kasheenadhura, Kasindhura, Kashin Dhura and Kasin Dhura) is a sacred Hindu temple located in Village Khwatari, District Pithoragarh, Uttarakhand 262541. The temple is an important spiritual center and pilgrimage destination in the Himalayan region of Devbhoomi Uttarakhand. This Temple is one of the best in Uttrakhand Temple.
Kaasin Dhura Temple is also commonly searched as Kasheenadhura, Kasindhura, Kashin Dhura and Kasin Dhura.

Shri Kaasin Dhura Temple
Village Khwatari, Pithoragarh, Uttarakhand 262541

Also known as:
Kaasin Dhura Temple, Kasheenadhura, Kasindhura, Kashin Dhura, Kasin Dhura, Kashindhura.